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शांति और दया की मूर्त – मदर टेरेसा

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नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित और एक महान संत घोषित हो चुकीं मदर टेरेसा का पूरा जीवन गरीब और बीमार लोगों की सेवा में गुजरा। दुनिया उन्हें मदर टेरेसा के नाम से जानती है, लेकिन वास्तविक में उनका नाम अगनेस गोंझा बोयाजिजू था।

26 अगस्त, 1910 को यूगोस्लाविया में जन्मीं और फिर बाद के वर्षों में भारत आकर लोगों की सेवा करने वाली मदर टेरेसा आज की आधुनिक दुनिया के लिए हमेशा एक प्रेरणास्रोत रहेंगी। मदर टेरेसा का जीवन जिन्होंने देखा है या उस दौर में जन्म लेने वाले हमेशा इस बात पर गर्व करेंगे कि उन्होंने उस दौर को देखा जिस दौर में मदर टेरेसा जैसी महान विभूति इस दुनिया में रहीं।

आज के दौर के लोग अगर मदर टेरेसा के उच्च विचारों को अपने जीवन में ढाल लें तो हमारे समाज में बुराई का बिलकुल खात्मा हो जायेगा।
मदर टेरेसा कहा करती थी,

“मैं हर देश से प्यार करती हूँ। मैं ईशवर की संतान हूँ,जो हर इंसान से प्यार करती है। ”

आप इनके विचारों से यह अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी सोच उनके सामाजिक सेवा की तरह उच्च थे। मदर टेरेसा को उनके जीवनकाल में गरीबों और वंचितों की सेवा और उत्थान के लिए कई पुरस्कार मिले। इसमें 1979 में मिला नोबेल शांति पुरस्कार सबसे प्रमुख था, जो उन्हें मानवता की सेवा के लिए प्रदान किया गया था।
मदर टेरेसा ने अपना पूरा जीवन गरीब और असहाय लोगों की भलाई के लिए समर्पित कर दिया था। वह सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेश में भी अपने मानवता के कार्यों के लिए जानी जाती हैं।

मदर टेरेसा अपनी मृत्यु तक कोलकाता में ही रहीं और आज भी उनकी संस्था 133 देशों में गरीबों के लिए काम कर रही है। उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के साथ भारत रत्न, टेम्पटन प्राइज, ऑर्डर ऑफ मेरिट और पद्म श्री से भी नवाजा गया है। ‘ लगातार गिरती सेहत की कारण 5 सितंबर 1997 को मदर टेरेसा की मौत हो गई।

उनका कहना था, ‘जख्म भरने वाले हाथ प्रार्थना करने वाले होंठ से कहीं ज्यादा पवित्र हैं.